राजश्री प्रोडक्शन (प्रा.) लि. की नींव ताराचंद बड़जात्या ने 1947 में रखी थी। सिनेमा कारोबार के तीनों अंगों-निर्माण, वितरण और प्रदर्शन- में समान रूप से राजश्री प्रोडक्शन सक्रिय रहा। राजश्री की ‘सौदागर’, ‘अंखियों के झरोखों से’, ‘गीत गाता चल’, ‘नदिया के पार’, ‘सारांश’ से लेकर ‘मैंने प्यार किया’ और ‘हम आपके हैं कौन’ जैसी फिल्में आज भी सिनेमाप्रेमियों के दिलों में बसती हैं। 1933 में मोतीमहल थिएटर में प्रशिक्षु के रूप में काम करने वाले ताराचंद बड़जात्या को कंपनी ने दक्षिण में भेजा, तो वहां कई फिल्म वालों समेत जेमिनी के एसएस वासन उनके गहरे मित्र बने। वासन की तमिल फिल्म ‘चंद्रलेखा’ (1948) जब घाटे का सौदा बनी तो बड़जात्या ने सूझबूझ से इस मरे हुए हाथी को सवा लाख का बना दिया था। कल ताराचंद बड़जात्या की 27वीं पुण्यतिथि है।
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