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Monday, November 26, 2018

हिंदी सिनेमा में ताजा हवा के झोंके की तरह यह ‘भोर’

‘भोर’ समाज के आखिरी पायदान पर जानवर-सी हालत में जी रहे मुसहर समाज का सिनेमाई क्लाइडोस्कोप है। यहां गांव के मुखिया ठाकुर साहब और उनका परिवार हिंसक खलनायक नही है। वे संरक्षक है। ताड़ी, ट्रैक्टर और बॉलीवुड की सिंफनी में सूअर, कीचड़ और मिट्टी का रोमांस है।

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