दक्षिण के चारों फिल्म उद्योग, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम- बहुत अनुशासित हैं। बार-बार उनका उदाहरण दिया जाता है कि वहां कलाकार समय पर सेट पर उपस्थित होते हैं। कम समय में फिल्में बना ली जाती हैं। फिल्म निर्माण से जुड़े सभी पक्ष जिम्मेदारी से अपने काम को अंजाम देते हैं। इतने सुव्यवस्थित उद्योग में अभिनेत्रियों का लगातार आत्महत्या करना, इसका सबसे कमजोर पक्ष है। सवाल उठ रहे हैं कि अगर दक्षिण भारतीय फिल्मजगत इतना अनुशासित है, तो अभिनेत्रियों के लिए इतना असुरक्षित क्यों बना हुआ है?
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