अच्छी कहानी पर बनी एक चुस्त फिल्म कैसे मध्यांतर के बाद अपनी पकड़ खोने लगती है उसका उदाहरण है ‘हिट -द फर्स्ट केस’। शुरू में ही ये बता दें कि ये तेलुगु में इसी नाम से बनी फिल्म का रिमेक और दोनों ही फिल्मों को डायरेक्ट भी शैलेश कोलानू ने ही किया है। ये विक्रम (राज कुमार राव) नाम के एक ऐसे पुलिस अधिकारी के बारे में है, जिसकी अपनी मनोवैज्ञानिक समस्या है। इस वजह से वो लगातार तनाव में रहता है और उसके मनोवैज्ञानिक का सुझाव है कि वो नौकरी छोड़ दे।
वो बहादुर है इसलिए छुट्टी लेकर पहाड़ पर चला जाता है, ताकि थोड़ा आराम मिल सके। लेकिन कुछ दिनों बाद ही उसे वहां खबर मिलती है कि उसकी प्रेमिका नेहा (सान्या मल्होत्रा), जो उसी के महकमे के फोरेंसिक विभाग में काम करती है, अचानक गायब हो गई है। विक्रम फटाफट जयपुर पहुंचता है और अपनी गर्लफ्रेड को खोजना शुरू करता है।
इसी क्रम में उसे सूचना मिलती है नेहा एक केस पर काम कर रही थी, जो प्रीति माथुर (रोज खान) नाम की एक लड़की से जुड़ा था। प्रीति भी गायब है। क्या नेहा और प्रीति एक ही शख्स की शिकार हैं? इसी मुद्दे पर पूरी फिल्म टिकी है। फिल्म का बेहतर पहलू राज कुमार राव का अभिनय है और एक ऐसे व्यक्ति की भूमिका उन्होंने बखूबी निभाई है जो खुद निजी समस्या से जूझ रहा है, फिर भी एक पुलिस अधिकारी के रूप में सक्षम है।
‘अपराधी कौन?’ की तलाश करने वाली ये फिल्म शुरुआती हिस्से में काफी प्रभावशाली है। लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है वैसे ही फिसलती जाती है। उसका कारण है फिल्म का निर्देशन। फिल्म में अपराधी की तरफ जानेवाले इतने सारे संकेत और सूत्र दिखाए गए हैं कि वो आपस में उलझ जाते हैं और अतं मे खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाली स्थिति हो जाती है। लेकिन अगर इस पहलू को थोड़ी देर के लिए नजरअंदाज कर दें तो ये फिल्म सस्पेंस और थ्रिलर शैली की एक अच्छी फिल्म है।
जहां तक सान्या मल्होत्रा के अभिनय बात है वो अत्यंत छोटी सी भूमिका में भी अच्छी लगी हैं। वैसे निर्देशक ने अगर फ्लैशबैक शैली का सहारा लेकर नेहा- विक्रम की कहानी को परतदार बनाया होता तो शायद फिल्म कुछ और बेहतर हो सकती थी।
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